Wednesday, October 30, 2013

इश्क में उनके

इश्क में उनके
कुछ इस तरह गिरते रहे
भरी महफिल में भी
तन्हा हम फिरते रहे

                 गुजर जाते थे करीब से
                 भी अनदेखा करके वो
                 आइना देख रोज -रोज
                 फिर भी हम संजते रहे

यूँ तो आसमान में
सितारे और भी थे
लाखों में में मगर
तलाश उनको करते रहे

               बागों की बहारें भी
               सुहाती नही थीं हमको
               कलियों में तो कभी फूलों
               में बस उनको ढूंढते रहे

मालूम था वो दिल
तोड़ ही देंगे एक दिन
दिल के तार उनसे ही
फिर भी हम जोड़ते रहे

               सुना था दर्द देता
               है दिल का लगाना
               दिल में बसा के उनको
               दिल्लगी हम करते रहे

यादों ने उनकी दी है
गम-ए -तन्हाई हमें
ऐ वक़्त ले चल कहीं
अब तनहाइयों से परे
उनकी यादों से परे . . . . . . . . . . . .

रातें गुजरती हैं महखाने में ....

अपनी भी क्या हस्ती बची है इस ज़माने में
रातें भी गुजर जाती हैं अब तो महखाने में
महोब्बत ने उनकी जख्म दिए हें हज़ारों
दिल का दर्द दूर होता नही दवाखाने में 
 
कभी हम भी तो शरीफ हुआ करते थे
क्यूँ आ पहुंचे फिर इश्क के बागानों में
किया करते थे कभी नफरत हम शराब से
अब तो एक घूंट भी नही छोड़ते पैमानों में
 
कितना अच्छा होता गर वो आखों से पिलाते
डूबकर मर जाते उनके आखों के प्यालों में
उनका चेहरा ही नज़र आता हर जगह
कुछ पल तो न होता महखाना " ख्यालों में "

घर-घर जा के तलाश की है हम ने, मिलती
नही इंसानियत अब इंसान के मकानों में
हो जाती है कुछ टूटे दिलों से मुलाकात यहाँ
इसीलिए हम रातें गुजर लेते हैं महखानों में .....................