Monday, June 3, 2013

क्यूँ

पत्थर दिलों से दिल 
लगते क्यूँ हो 
आखों के मोती अब 
व्यर्थ बहते क्यूँ हो
              कल तक भी तो  थे
              तुम अकेले ही 
             तन्हा समझकर आज 
             खुद को रुलाते क्यूँ हो 
पाया ही नही था 
तुमने कभी उनको 
खोने से फिर उनके 
खुद को डराते  क्यूँ हो
             दिल में उनका बस  जाना 
             महज इक  इत्तफाक था 
             सपनों में उनके अब 
             नीदें  गंवाते क्यूँ हो
समां तो आज का भी 
कम खुबसूरत नही 
गुजरे पलों की याद में 
जिन्दगी बिताते क्यूँ हो
            जानते हैं न हो पायेगा 
            दीदार अब उनका 
            देख - देख आइना फिर  
            खुद को संजाते क्यूँ हो  

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