Thursday, May 31, 2012

ये सिर्फ अपनों के लिये ही बहते हैं

कदम उनसे दूर जाने लगे 
मन में उथल -पुथल 
सी होने लगी 
वो साथ थे तब तक 
सब अच्छा था
अब ये आँखें भी 
बोलने लगीं 
इनकी नमी ह्रदय -व्यथा 
व्यक्त करने लगी 
और शायद आंसुओं की
उपस्तिथि बयां कर 
रही थी .
और हाँ कल जब वो आये 
तब भी ये नमीं थी ,
आंसूं बहे थे 
पर कल तो दिल में ख़ुशी 
का ठिकाना न था .
मैं भला अनजान खुद को 
कैसे समझाता कि
उनके आने कि ख़ुशी हो या 
जाने का गम , ये तो 
बहते ही हैं ,
और दोनों बार एक  जैसे  ही .
लेकिन इतना जरुर 
समझ में आया कि 
ये सिर्फ अपनों के लिये ही 
बहते हैं , कभी भी 
परायों के लिये नही 

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