Wednesday, December 8, 2010

जिसे मैंने दिल दिया

चेहरे पे क्या नूर था और
 आखों में क्या चमक थी उसके
पहली बार जब देखा उसको
 कदमों में दिल बिछाया था उसके 
चेहरा जैसे कमल हो उसका 
नयन थे जैसे मोती उसके 
सुरीली आवाज कर कोमल 
चेहरे के भाव अजीब थे उसके 

सामने जब आकर बेठी मेरे 
नैनों में नैन डाले थे उसके 
बोलना था शायद उसको कुछ 
इसीलिए होठ कांपे थे उसके 

पास मैं जब आया था उसके 
ख्यालों में खो गया था उसके 
पहले किसी को देखा न था ऐसे
जितना आज करीब था उसके 

सब कुछ खो बैठा  था मैं अपना 
आखों में मेरी सपने थे उसके 
लेकिन खुदा कि मर्जी को बदलना 
मेरे वस में था न वस में था उसके 

फिर एक दिन सजकर बारात 
लेने उसे घर आई थी उसके 
दिल फूट -फूट कर रोया था 
हाथों में मेंहदी लगी जब उसके 

जानता  हूँ दिल में बसी वो मेरे 
आखों में नमी तो होगी ही  उसके 
दीदार नही हो पाता है अब उसका 
पर तरसते हैं नैन दीदार को उसके 

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